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Thursday, 27 September 2007

सांस लेना भी कैसी आदत है
जीये जाना भी क्या रवायत है
कोई आहट नही बदन मे कहीं
कोई साया नही है आँखों मे
पा.नव बेहिस हैं , चलते जाते हैं
इक सफ़र है जो बहता रहता है कितने बरसों से,
कितनी सदियों से जिए जाते हैं, जिए जाते हैं

आदते भी अजीब होती हैं

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